अगर रोती है कहीं मां तो शिवालय रूठ जाते है :

जमीन से फ्लक तक का मुकाम लिख दिया।
उठा कर कलम कागज पर मां नाम लिख दिया।।
और कोई गुनाह नहीं किया मैंने बस दो - चार शेर ही पढ़े थे,
लोगों ने अमन नाम के आगे बदनाम लिख दिया।।

सीता की तरह खुद को अग्नि परीक्षा में उतारना चाहूंगा।
ओरो को दरिंदा कहने से पहले,
अपने अंदर का दरिंदा मारना चाहूंगा।।

निर्भया मर गई या मार दी गई,
इस बात पर कोई विवाद नहीं है।
लड़कियों को मारने के लिए दरिंदे लाखों है,
मगर चार दरिंदों के लिए एक जलाद नहीं है।।

जितना खुन तू अपनी रगो में लेकर चलता है,
उतना खुन तो वो चार दिन में बहा देती है।
इसी मिट्टी की ही बनी है वो भी,
बस कभी - कभी अपना नाम मां बता देती है।

रेप से पीड़ित, वो अपनी आखरी सांसे ले रही थी।
और उस फिकर इस बात की नहीं की जिंदा बचेगी या मर जाएगी।
बस किसी तरह मुदा टल जाए वरना बाप की इज्ज़त उछल जाएगी।।

________________बेजुबान क्यों है_________________

इतनी भीड़ में भी उसने उसके जिस्म को छूने की कोशिश की।
खुद ही खुद की नजरों में गिरने की साज़िश की।

उसने बड़ी आसानी से अपनी उंगलियों को उसके जिस्म से लगाया। 
वो बंदा इतनी आखों में भी थोड़ा सा ना शरमाया।

की वो मासूम सी बच्ची थोड़ा सहम सी गई थी।
बोलना तो दूर आवाज गले में ठहर ही गई थी।

ऐसे हालात में उसे अपने भाई की याद आई।
की सोचा क्यों नहीं ना मै उसी के साथ आई।

वो चीखना चाहती थी, वो चिलाना चाहती थी।
इस भीड़ में हर एक चेहरे को नींद से जगाना चाहती थी।
की कोई तो इस शक्श को रोक लो,
क्या मै तुम्हारी बेटी जैसी नहीं हूं,
बस यही जताना चाहती थी।।

बच्ची की खामोशी को वो उसे उसकी रजामंदी समझ बढ़ा था।
और खुद तो था वो, उसे भी गंदी समझ बढ़ा था।

पता नहीं कहां कहां उसके हाथ उसके जिस्म पर टिक रहे थे।
नजाने क्यों उसे उस मासूम के आंसू नहीं दिख रहे थे।

वो कुछ बोल भी ना पाई और उस पर इतना अत्याचार हो गया।
रोज कि तरह आज इतनी भीड़ में भी एक ओर बलात्कार हो गया।

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इंसानियत से यकीन उठ गया है मेरा,
पिछले कुछ दिनों में ऐसा व्यवहार देखा है।
हर दूसरा इंसान दरिंदा लगता है,
जब से निर्भया का बलात्कार देखा है।।

_________मां कुछ ऐसा तू होने मत देना।_____________

मेरे मरने के बाद किसी को रोने मत देना।
मां कुछ ऐसा तू होने मत देना।।

भाई की कलाई इस बार खाली ही रहेगी।
उसके माथे पर बस टिके की लाली ही रहेगी।
उस लाली को कभी तू धोने मत देना।
मां कुछ ऐसा तू होने मत देना।।

पापा पछताए होंगे सोच कर, कुछ कर नहीं पाया।
अपने बाप होने का फ़र्ज़ अदा कर नहीं पाया।
पापा को इस गम में खोने मत देना।
मां कुछ ऐसा तू होने मत देना।।

लोगों ने सड़कों पर धरने दिए तो होंगे।
जजों ने कोर्टो में फैसले किए तो होंगे।
पर अपनी उम्मीदों को कभी सोने मत देना।
मां कुछ ऐसा तू होने मत देना।।

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लाल रंग के छीटें, जो सने गए थे एक दामन पर,
ये जमाना वो दामन छुपा रहा था।
जो - जो कपड़े फट्टे थे, उस चीर हरण में,
एक बाप वो कपड़े जला रहा था।
और बात जो थोड़ी बढ़ी तो बात का चेहरा ही बदल दिया जमाने ने,
दोषी को भोला और भोले दोषी बता रहा था।

राम नमाज पढ़े,
और मै अलाह से आरती करना चाहता हूं।
जिस तरह औरतें डरती है बलात्कारों से,
उसी तरह मै हर नामर्द को डरना चाहता हूं।

कवि:- अमन जांगड़ा
प्रकाशक:- vipin kumar pandey g

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